शोकविजयम् - सांस्कृतिक एवं सामाजिक प्रासंगिकता
शोकविजयम् — सांस्कृतिक एवं सामाजिक प्रासंगिकता- डॉ.राजेंद्र चौधरी
सांस्कृतिक एवं सामाजिक प्रासंगिकता:
- ऐतिहासिक-धार्मिक संदर्भ: महाभारत का पौराणिक तथा
सांस्कृतिक भार नाटक को लोक-मान्यताओं
तथा नैतिक विमर्श के साथ जोड़ता है।
- समकालीन अनुकूलता: नाटक युद्धोपरान्त शरणार्थियों, पीड़ितों
तथा सामाजिक पुनर्वास के आधुनिक विमर्श से सहज संबंध बनाता है, इसलिए यह नाटक स्थानीय
व वैश्विक दर्शकों के लिए प्रासंगिक है।
- सांस्कृतिक संवेदनशीलता: नाटक में पात्रों व घटनाओं को
पौराणिक श्रद्धा का सम्मान करते हुए मानवोपयोगी संदेश के रूप में प्रस्तुत
किया गया है, जिससे धार्मिक भावनाओं का सम्मान
तथा सामाजिक समता दोनों बनायीं राखी जा सके।
- 'शोकविजयम्' महाभारत की पौराणिक पृष्ठभूमि में रचित होते हुए भी आज के समय से सीधा संवाद करता है। यह नाटक निम्नलिखित समकालीन प्रश्नों को रंगमंच पर जीवंत करता है:
o संघर्ष के
बाद सामाजिक
पुनर्निर्माण और
पुनर्वास की
आवश्यकता
o युद्ध एवं
हिंसा से
प्रभावित स्त्रियों
और बच्चों
के अधिकार
o अपराधबोध, पश्चाताप और मानसिक
स्वास्थ्य का
मानवीय आयाम
o सत्ता और
करुणा के
बीच संतुलन,
न्यायपूर्ण शासन
की अवधारणा
o विजेता-पराजित के भेद
से परे
समानुभूति और
समावेशिता
5. यह नाटक भारतीय रंगमंच की परम्परा को आधुनिक नाट्य-दृष्टि से जोड़ता है तथा दर्शकों में नैतिक और सामाजिक चेतना जागृत करने में सक्षम है।
Very good play for recent scenario...
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